शिक्षण सूत्र

शिक्षण सूत्र
प्रत्येक आचार्य की हार्दिक इच्छा होती है कि उसका शिक्षण प्रभावपूर्ण हो। इसके लिये आचार्य को कई बातों को जानकर उन्हे व्यवहार में लाना पड़ता है, यथा - पाठ्यवस्तु का आरम्भ कहां से क्या जाय, किस प्रकार किया जाय, छात्र इसमें रुचि कैसे लेते रहें, अर्जित ज्ञान को बालकों के लिये उपयोगी कैसे बनाया जाय, आदि।

शिक्षाशात्रियों ने शिक्षकों के लिये आवश्यक बातों पर विचार करके अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है, जिन्हें शिक्षण सूत्र के रूप में जाना जाता है.
प्रमुख शिक्षण सूत्र इस प्रकार है...
(१) ज्ञात से अज्ञात की ओर
बालक के पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित करते हे यदि नया ज्ञान प्रदान किया जाता है तो बालक को उसे सीखने में रूचि व प्रेराना प्राप्त होती है। मनुष्य सामान्यतया इसी क्रम से सीखता है। इसलिये अध्यापक को अप्नी पाठ्य सामग्री इस क्रम में प्रस्तुत करना चाहिये।
(२) सरल से कठिन की ओर
पाठ्यवस्तु को इस प्रकार प्रस्त्तुत करना चाह्ये कि कि उसके सरल भागों का ज्ञान पहले करवाया जाय तथा धीरे-धीरे कठिन भागों को प्रस्तुत किया जाय।
(३) सरल से जटिल (गूढ़) की ओर
(४) स्थूल से सूक्ष्म की ओर
सूक्ष्म तथा अमूर्त विचारों को सिखाते समय उनका प्रारम्भ आसपास की स्थूल वस्तुओं तथा स्थूल विचारों से करना चाहिये। बालक की शिक्षा सदैव स्थूल वस्तुओं तथा तथ्यों से होनी चाहिये; शब्दों, परिभाषाो तथा नियमों से नहीं।
(५) विशेष से सामान्य की ओर
किसी सिद्धान्त की विशेष बातों को पहले रखे, फिर उनका सामान्यीकरण करना चाहिये। गणित, विज्ञान, व्याकरण्, छन्द व अकंकार शास्त्र की शिक्षा देते समय इसी क्रम को अपनाना चाहिये। आगमन प्रणाली में भी इसी का उपयोग होता है।
(६) अनुभव से तर्क की ओर
ज्ञानेन्द्रियों द्वारा बालक यह तो जान लेता है कि अमुक वस्तु कैसी है किन्तु वह यह नहीं जानता कि वह ऐसी क्यों है। बार-बार निरीक्षण व परीक्षण से वह इन कारणों को भी जान जाता है। अर्थात् वह अनुभव से तर्क की ओर बढ़ता है। बालक के अनुभूत तथ्यों को आधार बनाकर धीरे-धीरे निरीक्षण व परीक्षण द्वारा उनकी तर्कशक्ति का विकास करने का प्रयत्न करना चाहिये।
(७) पूर्ण से अंश की ओर
बालक के सम्मुख उसकी समझ में आने योग्यपूर्ण वस्तु या तथ्य को रखना चाहिये। इसके बाद उसके विभिन्न अंशों के विस्तृत ज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिये। यदि एक पेड़ का ज्ञान प्रदान करना है तो पहले उसका सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत किया जायेगा तथा बाद में उसकी जड़ों, पत्तियों, फलों आदि का परिचय अलगलग करवाया जायेगा।
(८) अनिश्चित से निश्चित की ओर
(९) विश्लेषण से संश्लेषण की ओर
(१०) तर्क पूर्ण विधि का त्याग व मनोवैज्ञानिक विधि का अनुसरण करो
वर्तमान समय में मनोविज्ञान के प्रचार के कारण इस बात पर जोर दिया जाता है कि शिक्षण विधि व क्रम में बालकों की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं, रुचियों, जिज्ञासा और ग्रहण शक्ति को ध्यान में रखा जाय।
(११) इन्द्रियों के प्रशिक्षण द्वारा शिक्षा
(१२) प्रकृति का आधार


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